Saturday, December 12, 2015

उम्मीद

मुझे आपसे अपने लिए बहुत ही ज्यादा की उम्मीद है । आप को अपना सर्वश्रेष्ठ ही नहीं , मेरी अपेक्षाओं में से सबसे बेहतरीन बर्ताव करना ही होगा । अरे अब आप मुझसे उम्मीद मत रखिये । क्योंकि मैं जैसा हूँ , वैसा ही तो नज़र आऊंगा । ऐसा ही तो मेरा व्यवहार भी सामने आएगा । उफ़ ! अब आप नाराज़ क्यों होने लगे ? यह तो मैं अपने बारे में कह रहा था । आप तो ख्वामख्वाह अपने बारे में समझ बैठे ।

Monday, August 24, 2015

महिला उत्पीडन

एनसीआरबी के 1953 से लेकर 2011 तक के अपराध के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 1971 के बाद से देश में बलात्कार की घटनाएं 873.3 फीसदी तक बढ़ी हैं। इसके अलावा उन मामलों की फेरहिस्त भी काफी लंबी है जिनकी शिकायत थाने तक पहुंची ही नहीं या पहुंचने ही नहीं दी गई। स्वयं सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि बलात्कार से पीड़ित महिला बलात्कार के बाद स्वयं अपनी नजरों में ही गिर जाती है, और जीवनभर उसे उस अपराध की सजा भुगतनी पड़ती है, जिसे उसने नहीं किया। ऐसी स्थिति में सामाजिक प्रताड़ना से इनकार नहीं किया जा सकता । उस पर आरोपियों से पहले घर-परिवार से ही दबाव बनना शुरू हो जाता है । लेकिन इस सब के बीच हैं आंकड़ों का सच, जो बताते हैं कि भारत में महिलाओं के खिलाफ़ होने वाले अपराधों के अलावा अभियुक्तों के विरुद्ध पुख्ता सबूत न होने की वजह से भी उनकी रिहाई हो जाती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 2001 और 2010 के बीच एक लाख चालीस हज़ार से भी ज्यादा दर्ज हुए । इस तरह के मामलों में से कम से कम एक लाख ऐसे अभियुक्त थे, जिन्हें प्रमाण के अभाव में  निर्दोष करार दिया गया। मात्र 36,000 अभियुक्तों के खिलाफ ही अपराध साबित हो सके। गौर करने वाली बात ये भी है कि इस एक लाख में 14,500 से भी ज्यादा मामले ऐसे थे, जिनमे अभियुक्तों के खिलाफ नाबालिग लड़कियों का बलात्कार करने का आरोप था ।

Saturday, August 1, 2015

Nature

हमने प्रकृति के सुनिश्चित चक्र में अपने निहित स्वार्थों के लिए बदलाव के जो जाने-अनजाने प्रयास किये हैं । उसके दुष्परिणाम हमारे सामने आने लगे हैं। विकास का जो नया पैमाना बन चला है ,वो प्राकृतिक आपदाओं के लिए एक बड़ी वजह है। इंसान ने पृथ्वी के वातावरण और महासागरों के साथ जो खिलवाड़ किया है, उसकी वजह से पृथ्वी पर लगातार एक-के-बाद-एक प्राकृतिक विपत्तियाँ आ रही हैं । वह भी इतनी भयानक कि कुछ ही पलों में अनगिनत जानें चली जाती हैं , अरबों-खरबों की संपत्ति नष्ट हो जाती है । कुछ लालची लोग अपने ही दुष्कृत्यों की सजा अपने साथ साथ पृथ्वी के तमाम लोगों को दे रहे है । विशेषज्ञों का कहना है कि आए दिन तूफान, चक्रवात, बारिश, सूखा, कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में वृद्धि और दिन-ब-दिन जन्म लेती जानलेवा बीमारियां अपने वीभत्स रूप की ओर अग्रसर हैं । सबसे बड़ी बात यह है कि हम अभी भी इस दिशा में सार्थक प्रयास नहीं कर रहे है । जिससे भविष्य में हालात के और बदतर होने की ही संभावना है।

Friday, July 31, 2015

देश का नक़्शा

‘बुलेट ट्रेन’ की तेज़ी से देश के हालात बदलने की उम्मीद जगी थी । देश को लगा कि थ्री डी और फ़ोर जी जैसे फ़ॉर्मूले देश का नक़्शा बदल कर रख देंगे । देश का नक्शा तो बदला लेकिन बांग्लादेश को जमीन के आदान प्रदान के जरिये,जिसमें भारत ने ज्यादा जगह देकर पडोसी से ‘अच्छे’ का तमगा हासिल कर लिया ।देश को लगा की उसका रहन-सहन बदल जाएगा ।लिबास तो बदला दिखाई दिया , देश ने एक बहुत महंगा कोट पहले पहने और फिर नीलाम होते देखा।

Saturday, July 4, 2015

असमाजिकता एवं अमानवीयता

जैसे शारीरिक रोगों के लिए कडवी दवाई आवश्यक है , वैसे ही

असमाजिकता एवं अमानवीयता की गिरफ्त में फंसे मानसिक

रोगियों के लिए कडा व्यवहार भी आवश्यक हो जाता है
। 

Wednesday, March 25, 2015

भ्रूण हत्या

भारत को अपनी अजन्मी बेटियों के भ्रूण हत्या के असामाजिक कृत्य को अपने सामाजिक दायरे से जुदा ना कर पाने का दंश लगातार बर्दाश्त करना पड रहा है। हर साल ऐसी 6 लाख बच्चियां जन्म नहीं ले पातीं जिन्हें देश के औसत लिंग अनुपात के हिसाब से दुनिया में आना था। देश में पुरूष-महिला लिंगानुपात के बीच की खाई लगातार बढ़ती ही जा रही है। विश्व स्तर पर हुए एक हालिया अध्ययन के मुताबिक आज हमारे देश में एक हजार पुरुष की तुलना में महिलाओं की संख्या 940 रह गई है। यह अंतर दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। लड़कियों की घटती संख्या और शिक्षा तथा रोज़गार के क्षेत्र में उनकी बढती सहभागिता के बावज़ूद हमारे सामाजिक ढांचे में लड़कियों और स्त्रियों की हैसियत में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आ पाया है । जिस देश में नारी रूप में अनेक देवीयों की पूजा अर्चना की जाती है। उस देश में बेटीयों को अपने अस्तित्व के लिए संर्घष करना पङ रहा है। बेटा वंश परंपरा को आगे बढ़ाता है, बेटा मां-बाप के साथ रहकर बुढ़ापे का सहारा बनता है ,जैसी दलीलें पुरुष प्रधान समाज ने विकसित की । वही सामाजिक ताने बाने ने लड़कियों के लिए भरण पोषण, दहेज़ के साथ साथ शारीरिक सुरक्षा की भी चिंता पैदा कर दी । इन्ही सब के मध्य बालक-बालिका के बीच पनपता भेदभाव लोगों के मन से निकल कर आंकड़ों के भयावाह स्वरुप में हमारे सामने आ खड़ा हुआ है । 

Thursday, February 26, 2015

ज़हरीले बयानों की राजनीति

ज़हरीले बयानों के ज़रिये ध्रुवीकरण की कोशिश हो , या बेहूदा बयानों से किसी के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने की हरकत हो , सामूहिक निंदा की आवाज़ आनी ही चाहिए ।  गर्म होती फिजाओं के दरमियाँ समाज की साझा विरासत और अमन को नुकसान पहुंचाने की कोशिशों को नज़रंदाज़ करना मुनासिब नहीं है ।  सामान्य नागरिकों को उकसाने की यह कोशिशे लोकतंत्र की मूलभावना के खिलाफ है  ।  परन्तु अफ़सोस , वोट के फायदे के गणित के आगे सही-गलत का आंकलन बौना साबित हो रहा है ।  रही सही कसर चैनल की ब्रेकिंग न्यूज़ की लगातार चिल्लाती आवाज़ ने पूरी कर दी ।  इन सब चीजों से ध्रुवीकरण कितना हुआ या नहीं , यह बताना तो मुश्किल है ।  पर अमन के दरमियाँ कुछ नए नफरत के बीज बोने में यह कामयाब ज़रूर हो गए ।  जब बात  चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ में सुर्खियाँ पाने की हो तो कई नाम आगे आ जाते हैं ।  सो दे दिया एक विवादस्पद बयान और बन गई सुर्खियाँ । 
क्या इन नेताओं का मकसद सिर्फ दलीय राजनीति का परचम फहराना ही रह गया है ? जब देश आर्थिक विकास के दोराहे पर खड़ा हो कर किसी सशक्त नीति की आस देख रहा है , हमारे राजनीतिक दल सिर्फ सत्ता में आने के ख्वाब पाल कर जायज़-नाजायज़ के फर्क को अनदेखा कर हर रास्ता अपनाने को तैयार हैं । राजनीतिक दलों की सोच सिर्फ कुर्सी तक सीमित हो गई है , शायद वह सोचते हैं कि सत्ता पा लो । देश का तो बाद में सोचेंगे । जिस आज़ादी को हमने बड़ी-बड़ी कुर्बानियों के बाद हासिल किया है , उसकी कीमत का अंदाज़ा शायद इन लोगो को नहीं है। इन लोगो को यह समझाना जरुरी हो चला है कि आपके काम के साथ हम आपकी भाषा पर भी नज़र रखेंगे । ताकि यह लोग हमारे बीच कोई दरार पैदा करके स्वार्थ सिद्ध ना कर सके । देश को रचनात्मक प्रयासों की जरुरत है , ना कि ज़हर बूझे बयानों की । नफरत को इन ज़हरीले बयानों से हवा दी जा सकती है , तरक्की को नहीं । विकास ,अमन और चैन के दरमियाँ ही पनप सकता है , ज़हरीले बयानों के बीच नहीं  । और अब ज़िम्मेदारी हम सबके ऊपर है ।


Wednesday, February 25, 2015

अमन की बात

अमन की बात करना बेहतर रास्ता है ! फिर भी अलगाव की कोशिशों को सोशल मीडिया पर हवा देने का काम कुछ लोग कर रहे हैं ! इस समाज के लिए , इस देश के लिए , और इंसानियत के लिए हमारी कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं ! जो हम को निभाना ही चाहिए ! मगर कुछ लोग सच्ची – झूठी बातों को नमक मिर्च लगा कर हवा देते हैं ! हमारी प्रतिबद्धता किसी भी धर्म के लिए हो सकती है ! धार्मिक होना अच्छी बात है ! पर धर्म के अधूरे ज्ञान की पोटली लिए यह लोग धर्म के मूल भाव इंसानियत को भूल जाते हैं ! 
अपराध , सिर्फ अपराध होता है ! इसको धार्मिक पहचान नही दी जा सकती ! दोषी को सजा मिलनी ही चाहिए ! पर दोषी को सजा मिल पाए उससे पहले ही कई निर्दोष दंगों की बलि चढ़ जाएँ ! यह कहाँ की समझदारी है ? अगर हम सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं , अगर हम लिख सकते हैं , तो हमारी कोशिश कुछ अच्छा करने की क्यों नहीं होती ? हम अमन के पैरोकार बन कर क्यों नहीं उबरते ? दुःख देने के बजाय सुख देने का एहसास हासिल कर के क्यों नहीं देख लेते ? जोड़ने का सुख , तोड़ने के दुःख से कहीं बेहतर एहसास होता है !

समाज का ढर्रा

कोई घटना होने पर सामाजिक संघटनो का प्रतिरोध सड़कों पर नज़र आता है ।उस वक़्त कार्यवाही के लम्बे चौड़े वायदे होते हैं । तत्पश्चात व्यवस्था फिर उसी ढर्रे पर सवार नज़र आती है । क्या हमें बार-बार बलात्कार की घटना हो जाने के बाद प्रतिवावद और आंदोलन की जरूरत है ? आखिर क्यों नहीं एक सशक्त कानून और उसका पालन करता तंत्र सामने आता ? आखिर क्यों नहीं हमारा समाज पीडिता के पक्ष में , और आरोपी के विरोध में मजबूती के साथ नज़र आता है ?