Thursday, February 26, 2015

ज़हरीले बयानों की राजनीति

ज़हरीले बयानों के ज़रिये ध्रुवीकरण की कोशिश हो , या बेहूदा बयानों से किसी के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने की हरकत हो , सामूहिक निंदा की आवाज़ आनी ही चाहिए ।  गर्म होती फिजाओं के दरमियाँ समाज की साझा विरासत और अमन को नुकसान पहुंचाने की कोशिशों को नज़रंदाज़ करना मुनासिब नहीं है ।  सामान्य नागरिकों को उकसाने की यह कोशिशे लोकतंत्र की मूलभावना के खिलाफ है  ।  परन्तु अफ़सोस , वोट के फायदे के गणित के आगे सही-गलत का आंकलन बौना साबित हो रहा है ।  रही सही कसर चैनल की ब्रेकिंग न्यूज़ की लगातार चिल्लाती आवाज़ ने पूरी कर दी ।  इन सब चीजों से ध्रुवीकरण कितना हुआ या नहीं , यह बताना तो मुश्किल है ।  पर अमन के दरमियाँ कुछ नए नफरत के बीज बोने में यह कामयाब ज़रूर हो गए ।  जब बात  चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ में सुर्खियाँ पाने की हो तो कई नाम आगे आ जाते हैं ।  सो दे दिया एक विवादस्पद बयान और बन गई सुर्खियाँ । 
क्या इन नेताओं का मकसद सिर्फ दलीय राजनीति का परचम फहराना ही रह गया है ? जब देश आर्थिक विकास के दोराहे पर खड़ा हो कर किसी सशक्त नीति की आस देख रहा है , हमारे राजनीतिक दल सिर्फ सत्ता में आने के ख्वाब पाल कर जायज़-नाजायज़ के फर्क को अनदेखा कर हर रास्ता अपनाने को तैयार हैं । राजनीतिक दलों की सोच सिर्फ कुर्सी तक सीमित हो गई है , शायद वह सोचते हैं कि सत्ता पा लो । देश का तो बाद में सोचेंगे । जिस आज़ादी को हमने बड़ी-बड़ी कुर्बानियों के बाद हासिल किया है , उसकी कीमत का अंदाज़ा शायद इन लोगो को नहीं है। इन लोगो को यह समझाना जरुरी हो चला है कि आपके काम के साथ हम आपकी भाषा पर भी नज़र रखेंगे । ताकि यह लोग हमारे बीच कोई दरार पैदा करके स्वार्थ सिद्ध ना कर सके । देश को रचनात्मक प्रयासों की जरुरत है , ना कि ज़हर बूझे बयानों की । नफरत को इन ज़हरीले बयानों से हवा दी जा सकती है , तरक्की को नहीं । विकास ,अमन और चैन के दरमियाँ ही पनप सकता है , ज़हरीले बयानों के बीच नहीं  । और अब ज़िम्मेदारी हम सबके ऊपर है ।


Wednesday, February 25, 2015

अमन की बात

अमन की बात करना बेहतर रास्ता है ! फिर भी अलगाव की कोशिशों को सोशल मीडिया पर हवा देने का काम कुछ लोग कर रहे हैं ! इस समाज के लिए , इस देश के लिए , और इंसानियत के लिए हमारी कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं ! जो हम को निभाना ही चाहिए ! मगर कुछ लोग सच्ची – झूठी बातों को नमक मिर्च लगा कर हवा देते हैं ! हमारी प्रतिबद्धता किसी भी धर्म के लिए हो सकती है ! धार्मिक होना अच्छी बात है ! पर धर्म के अधूरे ज्ञान की पोटली लिए यह लोग धर्म के मूल भाव इंसानियत को भूल जाते हैं ! 
अपराध , सिर्फ अपराध होता है ! इसको धार्मिक पहचान नही दी जा सकती ! दोषी को सजा मिलनी ही चाहिए ! पर दोषी को सजा मिल पाए उससे पहले ही कई निर्दोष दंगों की बलि चढ़ जाएँ ! यह कहाँ की समझदारी है ? अगर हम सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं , अगर हम लिख सकते हैं , तो हमारी कोशिश कुछ अच्छा करने की क्यों नहीं होती ? हम अमन के पैरोकार बन कर क्यों नहीं उबरते ? दुःख देने के बजाय सुख देने का एहसास हासिल कर के क्यों नहीं देख लेते ? जोड़ने का सुख , तोड़ने के दुःख से कहीं बेहतर एहसास होता है !

समाज का ढर्रा

कोई घटना होने पर सामाजिक संघटनो का प्रतिरोध सड़कों पर नज़र आता है ।उस वक़्त कार्यवाही के लम्बे चौड़े वायदे होते हैं । तत्पश्चात व्यवस्था फिर उसी ढर्रे पर सवार नज़र आती है । क्या हमें बार-बार बलात्कार की घटना हो जाने के बाद प्रतिवावद और आंदोलन की जरूरत है ? आखिर क्यों नहीं एक सशक्त कानून और उसका पालन करता तंत्र सामने आता ? आखिर क्यों नहीं हमारा समाज पीडिता के पक्ष में , और आरोपी के विरोध में मजबूती के साथ नज़र आता है ?